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*प्रज्जवलित रखें शिक्षा की ज्योति — राकेश नारायण बंजारे

🔥. *प्रज्जवलित रखें शिक्षा की ज्योति*
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आज गितिका के दसवीं कक्षा का रिजल्ट देखकर हतप्रभ रह गया। बाप रे… अद्भुत, आश्चर्यजनक, अतुलनीय। प्रत्येक विषयों में सौ-सौ नंबरों में से मात्र तीन-तीन नंबर कटे हैं। 97,97,97……. सचमुच ईश्वर देता है तो छप्पर फाड़कर, लेकिन यह ईश्वर द्वारा नहीं, बोर्ड द्वारा प्रदत्त नंबर हैं। इतना विशाल की सैलाब आ जाए।
फिलहाल.. कोरोनावायरस से सारी दुनिया त्रस्त है। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। लोग असमय काल-कवलित हो रहे हैं। आक्सीजन सिलेंडर, बेड, हास्पीटल, ईलाज की मारामारी मची हुई है। गंगा नदी में तैरते सैकड़ों शव, कभी कल्पना में भी नहीं था कि ऐसे दिन भी आएंगे।
अप्रैल-मई का महीना इतना दहशत भरा कभी नहीं रहा। हां, बच्चों के लिए परीक्षा और परीक्षा परिणाम को लेकर आशंका, कौतूहल और कुछ मात्रा में तनाव सामान्य बात रही है लेकिन लोग इतने सहमें-सहमें कभी नहीं रहे। चारों तरफ छाए निराशा के बादलों के बीच घोषित परीक्षा परिणाम ने चाहे जिस भी तरीके से हो, बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है। और ना केवल मुस्कान बल्कि खिलखिलाहट ला दी है। यूं तो कोरोना काल में यह निश्चित था कि सभी बच्चे पास होंगे और अच्छे नंबरों से पास होंगे, लेकिन यह सपनों में भी नहीं था कि वे ‘इस कदर’ पास हो जाएंगे। हंड्रेड परसेंट बच्चे पास हुए हैं, बधाइयां, और लगभग छियानवे-संतान्वे (96.81) प्रतिशत बच्चे फर्स्ट डिवीजन से उत्तीर्ण हुए हैं। रिजल्ट देखकर उन्हें खुद पर यकीन नहीं हो रहा। एक विद्यार्थी काल करके भरपूर उत्साह से बोली कि सर आज तक भरपूर मेहनत करने के बाद भी कभी सेकंड डिविजन से आगे क्रास नहीं कर पाई थी, आज कोरोना के चलते ही सही 90% से ऊपर अंक आए हैं। उसकी खुशी देख मन गदगद हो गया। कोरोना काल में खुशी कहीं से भी किसी रूप में मिले, स्वागतेय है।
कोरोना महामारी के कारण ही सही। बेशक अन्य मामलों में ना सही, ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा दसवीं रिजल्ट के मामले में तो सार्थक हुआ।
रिजल्ट का निर्धारण साल भर जमा किए गए असाइनमेंट एवं अन्य को आधार मानकर किया गया है। साल भर आनलाईन क्लासेज भी अपने अनुसार से चलती रहीं। कोरोना काल में यही सार्थक उपाय था। किसी को भी फैल नहीं किया गया है। रिजल्ट घोषित होने के बाद परिणामों को लेकर तो चुटकुलों की बौछारें हैं लेकिन कोरोना काल में बोर्ड द्वारा तय किए गए नियम के अलावा किसी और विकल्प के बताए जाने पर चारों तरफ मौन है।
याद आता है एक चित्रकार का संस्मरण। जब उसने अपने बनाए चित्र चौराहे पर इस अनुरोध के साथ रखवा दिया कि इसमें गलतियां बताई जाएं। शाम को चित्र देखने पर ढेर सारी गलतियों की ओर संकेत किया गया था। वही चित्र दूसरे दिन इस अनुरोध के साथ उसी चौराहे पर रखवा दिया गया कि इसमें गलतियां चिन्हांकित कर उसे सुधारने की भी कृपा करें। शाम तक ना तो एक भी गलती चिन्हांकित की गई थी और ना ही किसी प्रकार का कोई सुझाव आया था।
निश्चित रूप से कोरोना ने जन-धन का व्यापक नुकसान तो किया ही, लेकिन सर्वाधिक वज्रपात शिक्षा जगत पर हुआ है। 14 मार्च 2020 से विद्यालय का द्वार बंद हुआ तो अभी तक शिक्षा का मंदिर अपने बच्चों की किलकारियों को तरस रहा है। इस दौरान चंद दिनों के लिए विद्यालय पुनः प्रारंभ करने के प्रयास भी हुए। समय-समय पर गैर शैक्षणिक कार्यों के लिए विद्यालय खुलते रहे लेकिन बच्चों का प्रवेश निषेध ही रहा। आनलाईन कक्षाओं की संख्या बढ़ाई गई लेकिन गुरु-शिष्य के बीच गुरुकुल में जो विद्याध्ययन होता है उस ऊंचाई तक पहुंचने में आधुनिक टेक्नोलॉजी को अभी समय लगेगा। हर जगह कंप्यूटर, मोबाइल, नेटवर्क, प्रशिक्षण की सुविधा नहीं पहुची है जिसके कारण तमाम दिक्कतें सामने आईं।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत चहलकदमी कर रहा है। देश में बहुत कम क्षेत्र ऐसे बचे होंगे जहां लोग शिक्षा के महत्व से परिचित ना हों। कोरोनावायरस ने मजबूर कर दिया कि हम घरों में कैद होकर रह जाएं। विद्यालय बंद हैं, पढ़ाई ढप्प है। जान के लाले पड़े हैं। संकट गहरा है, आगे अंधेरा है। बावजूद भी शिक्षा की ज्योत जलती रहनी चाहिए।
शिक्षा से मानव का व्यक्तित्व संसार के लिए बहुपयोगी बनता है वह मानवता की ओर कदम बढ़ाता है। शिक्षा प्राप्ति से विनयशीलता बढ़ती है, यह तर्क, चेतना, अंतर्मन के कपाट खोलता है इसलिए इसके अवरुद्ध होने पर चिंता स्वाभाविक है।
अनाटोले फ्रांस के विचार से “शिक्षा का ये मतलब नहीं कि आपने कितना कुछ याद किया हुआ है या ये कि आप कितना जानते हैं, इसका मतलब है आप जो जानते हैं और जो नहीं जानते हैं उनमें अंतर कर पाना।” अगर यह अंतर कहीं भी जानने को मिल जाए, समझिए आपकी शिक्षा जारी है। उचित शिक्षा से व्यक्ति की गरिमा, स्वाभिमान की भावना में बढ़ोतरी तथा विश्व बंधुत्व के प्रति चिंतन, वसुधैव कुटुम्बकम की सद्भावना जागृत होती है। घर-परिवार में रहते हुए भी यह भावना जागृत हो सकती है। जरुरी नहीं कि विद्यालय जाकर ही यह शिक्षा प्राप्त हो।
इसी संदर्भ में एंसर्ट डीमेंट कहते हैं “सीखना, सिखाना जीवन भर चलने वाली सतत् प्रक्रिया है।” अतः जहां भी जैसी भी परिस्थितियों में रहें सीखने, सिखाने की प्रक्रिया चलती रहे। अल्विन टोफ्लर ने कभी कहा था ‘भविष्य में वो अनपढ़ नहीं होगा जो पढ़ ना पाए, अनपढ़ वो होगा जो ये नहीं जानेगा कि सीखा कैसे जाता है।’ वर्तमान परिस्थितियों में उनके कथन प्रासंगिक लगते हैं। नई टेक्नोलॉजी में पीछे रहने वाले क्रमशः पिछड़ते चले जाएंगे अतः शिक्षा के लिए हर संभव टेक्नोलॉजी का सदुपयोग करते चलें।
इन विद्वानों के विचारों पर चलकर नैतिकता, सदाचार की शिक्षा विपरीत परिस्थितियों में भी जारी रखी जा सकती है।
परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है और ‘मां’ प्रथम शिक्षक। अभिभावक प्रमुख मार्गदर्शक। जिम्मेदारी से कतराएं नहीं। बच्चों को मोबाइल, टीवी का संयमित इस्तेमाल सिखाएं। शिक्षा प्राप्ति जीवन का उद्देश्य हो। यह उद्देश्य किसी भी परिस्थिति में ना छूटे ये सुनिश्चित करते रहें ताकि शिक्षा की ज्योत कोरोना काल में भी प्रज्जवलित रहे।

— राकेश नारायण बंजारे
खरसिया.

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